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अपराधियों को पकड़ने के लिए नहीं हो सकता आधार डाटा का इस्तेमाल….

क्या आप जानते है आधार कार्ड की स्थापना कैसे हुई और कब और किसने शुरू किया आधार कार्ड से जुड़ी इन मुहिम को.. नहीं ना तो चलिए हम आज आपको बताते हैं और उसके साथ-साथ हम आपको यह भी बताएंगे कि आरोपियों को कैसे उनके आधार कार्ड डिटेल से नहीं पकड़ा जा सकता है। इससे पहले जानते हैं आधार कार्ड की शुरुआत कैसे हुई और कब और किसने आधार कार्ड की शुरुआत की और आधार कार्ड को एक पहचान पत्र की तरह भारत में लाया गया और लागू किया गया।

23 मई 2001: वर्ष 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपे गए राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्ट में सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए पहचान पत्र की सिफारिश की गई थी। वर्ष 2001 में L K Advani की अध्यक्षता वाले एक मंत्रीीय समूह ने आईडी कार्ड की सिफारिश को मंजूरी दे दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि “multi-purpose National Identity Card” परियोजना जल्द ही शुरू की जाएगी। 28 जनवरी 2009 UIDAI (Unique Identification Authority of India) की स्थापना की गई।

Aadhaar Authentication Application Programming Interface

23 जून 2009 : आधार परियोजना का नेतृत्व करने के लिए Infosys के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी को नियुक्त किया गया। वह अब UIDAI के अध्यक्ष हैं।

2010 : UIDAI’s Logo का अनावरण किया गया साथ ही देश भर में नामांकन अभियान शुरू किया गया।

29 सितम्बर 2009 : पहला UID नंबर नंदुरबार, महाराष्ट्र के निवासी को जारी किया गया।

20 नवम्बर 2012 : आधार पर Legislative और राज्य की चिंताओं से यह सर्वोच्च न्यायालय (SC) पहुंचा न्यायालय ने National Identification Authority of India Bill, 2010 के खिलाफ बहस का हवाला किया।

23 सितम्बर 2013 : सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कहा ​है कि केंद्र आधार कार्ड से वंचित नागरिकों को सरकारी लाभों देने से इनकार नहीं कर सकता है।न्यायालय ने पुष्टि की कि आधार स्वैच्छिक है अनिवार्य नही।

1 जुलाई 2014 : 1 जुलाई को, नीलेकणी ने प्रधान मंत्री मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात कर उन्हें UIDAI के लाभों से अवगत कराया। हालांकि BJP ने पूर्व में UIDAI का विरोध किया था और पूरे कार्यक्रम को खत्म करने की इच्छा व्यक्त की थी।

4 जुलाई 2014: प्रधान मंत्री मोदी ने घोषणा की कि उनकी सरकार इस प्रोजेक्ट को बरकरार रखेगी और परियोजना को पासपोर्ट के साथ जोड़ने के लिए अधिकारियों से बात करेगी।

11 मार्च 2016 : आधार विधेयक, 2016 को लोकसभा में पारित किया गया। राज्यसभा ने गोपनीयता के मुद्दों पर कुछ सिफारिशों के साथ इसे वापस भेज दिया|हालांकि, बिल एक मनी बिल है, परिणामस्वरूप, सिफारिशों को लोकसभा ने अस्वीकार कर दिया|और आधार अधिनियम, 2016 को लागू हो गया।

15 सितम्बर 2016: सरकार ने घोषणा की कि government subsidies और लाभों का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य होगा।

4 अक्टूबर 2016 : रसोई गैस LPG(SUBSIDY) का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य है। नागरिकों को UID प्राप्त करने के लिए दो माह का समय दिया गया है।

दिसम्बर 2016: आधार नामांकन में लगभग सभी भारतीय शामिल हो गए। सार्वजनिक क्षेत्र में आधार प्रति वर्ष 40 अरब डॉलर की सब्सिडी वितरित करने में मदद करता है।लगभग 300 million bio metric entries नागरिकों के बैंक खातों से जोड़ी गई हैं, जिससे उन्हें सीधे भुगतान किया जा सकता है।

जनवरी 2017: सरकार ने 30 से ज्यादा केंद्रीय योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य बना दिया जिसमें स्कूली बच्चों के लिए free mid day meal और विकलांग लोगों के लिए welfare programs शामिल हैं।

7 फरवरी 2017 : सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र को सभी आधार को मोबाइल नंबरों से जोड़ने का निर्देश दिया।

27 मार्च 2017 : सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने दोहराया है कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बना सकती है।

इन सबके बाद आधार कार्ड को हर भारतीय के जरूरी दस्तावेज से लिंक कराना अनिवार्य कर दिया गया धीरे-धीरे इस प्रक्रिया को कार्य में लाया गया और सभी जरूरी दस्तावेज के साथ आधार कार्ड लिंक करना अनिवार्य कर दिया गया। मोदी सरकार द्वारा इसकी पहल की गई साल 2014 में जब उन्होंने आधार कार्ड को एक ID प्रूफ के तौर पर घोषित किया और उन्होंने यूआईडीएआई के जरिए आधार कार्ड को एक जरूरी दस्तावेज घोषित किया गया और सबके लिए अनिवार्य बताया गया। धीरे-धीरे भारत को डिजिटल बना दिया गया लेकिन डिजिटेलिटी के चलते बहुत से घपले ऐसे भी होने लगे जिससे भारत की जनता बहुत परेशान है।

जी हां क्या आप जानते हैं कि आधार कार्ड की जानकारी के आधार पर किसी भी अपराधी को नहीं ढूंढा जा सकता है। आधार की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है इसी बीच इसी बीच यूआईडीएआई ने शुक्रवार को राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) को अपराध जांच के लिए आधार बॉयोमीट्रिक डेटा साझा करने से इनकार कर दिया। यूआईडीएआई ने इसके लिए काफी तर्क भी दिए। बता दें, हाल ही में एनसीआरबी चीफ ने आधार बॉयोमीट्रिक डेटा को साझा करने की बात कही थी।

यूआईडीएआई ने एनसीआरबी के साथ डाटा साझा करने से इनकार कर दिया। साथ ही इनके पीछे तर्क भी दिए। आधार कानून के सेक्शन 29 के अनुसार यूआईडीएआई द्वारा लिया गया डाटा केवल आधार धारकों की पहचान प्रमाणित करने और आधार के लिए ही किया जा सकता। इसका इस्तेमाल किसी दूसरे काम के लिए नहीं किया जा सकता है।

19वें ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑफ डायरेक्टर्स ऑफ फिंगरप्रिंट ब्यूरो में बोलते हुए एनसीआरबी चीफ इश कुमार ने कहा था कि देश भर में करीब 50 लाख केस हर साल रजिस्टर होते हैं। इनमें करीब 80-85 प्रतिशत लोग पहली बार अपराध करते हैं, जिनका पुलिस के पास कोई रिकॉर्ड नहीं होता है। इसके अलावा हर साल करीब 40,000 शव बरामद होते हैं, जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाती है। आधार डेटा के जरिए इन शवों की शिनाख्त की जा सकती है और उन्हें उनके परिजनों को सौंपा जा सकता है।

वहीं, इस मामले में गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर का कहना था कि एनसीआरबी डायरेक्टर के प्रस्ताव पर मंत्रालय में चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘हम इस सुझाव को मानने की कोशिश करेंगे। यह कदम अपराध रोकने में अहम हो सकता है।’

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